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हम भला संसार में क्यों आए हैं?
हमारा संसार में आने का उद्देश्य
हमारा उद्देश्य मनुष्य को उसकी मूल चेतना में वापस लाना है। जब बरसात से जल बरसता है तो वह आसुत जल की भांति प्रदूषण रहित होता है किंतु भूमि का स्पर्श करते ही वह गंदा हो जाता है इसी प्रकार मूलतः हम शुद्ध आत्मा है कृष्ण के अंश हैं। भगवान कृष्ण गीता में कहते हैं
ममैवांशो जीवलोके जीवभूत सनातन।
अर्थात- इस बद्ध जगत में सारे जीव मेरे अंश है और वे शाश्वत हैं।
इस प्रकार सारे जीव कृष्ण भगवान का अंश हैं हमें सदा यह स्मरण रखना चाहिए जब हम कृष्ण की बात करते हैं तो हम भगवान की बात करते हैं
जिस प्रकार सोनी का एक कण गुण दृष्टि से सोने की खान के ही समान होता है उसी प्रकार कृष्ण के शरीर के सूक्ष्म अंश भी कृष्ण के ही समान हैं। अर्थात हम गुणात्मक दृष्टि से भगवान के ही समान है लेकिन मनुष्य को यह सदा स्मरण रखना चाहिए सोने की खान तथा सोने के कण में गुणात्मक दृष्टि से कोई भिन्नता नहीं होती लेकिन वह भी भिन्नता मूल्य के अनुसार होती है।
यहां पर भगवान को अग्नि के अनुसार भी बताया जाता है जिस प्रकार भगवान एक प्रज्वलित अग्नि के समान हैं और हम उनके अंश चिंगारीयों के समान है यद्यपि चिंगारी और अग्नि में गुणात्मक भेद नहीं है लेकिन अग्नि से अन्न पकता है चिंगारी से नहीं।
बहुत से लोग आत्मा और परमात्मा में अंतर नहीं समझ पाते ऊपर आपको दो प्रकार के उदाहरणों से स्पष्ट यह अंतर बता दिया गया है।
दूसरी पंक्ति में भगवन कहते हैं
मन षष्ठणी इंद्राणी प्रकृति स्थानी कारर्षति।
लेकिन बद्ध जीव होने से वे मन समेत छहों इंद्रियों से कठोर संघर्ष कर रहे हैं।
जिस प्रकार वर्षा का जल भूमि पर गिरते ही गंदा हो जाता है उसी प्रकार हम भी भौतिक जगत के संपर्क में आए तथा इसके प्रभावों से जो कि काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सर से दूषित हो गए।
भगवान को कैसे समझें
बहुत से लोगों के मन में यह प्रश्न रहता है क्या भगवान होते हैं और उनको कैसे समझा जा सकता है यहां पर कुछ उदाहरण प्रभुपाद जी देते हैं जब एक मूर्ख किसी यंत्र को देखता है तो वह सोच सकता है कि यह स्वता चल रहा है किंतु वास्तव में ऐसा नहीं होता उसका एक चालक होता है जो उसे वश में रखता है। भले ही हम अपनी दोषपूर्ण दृष्टि के कारण उस नियंता कोई यंत्र के पीछे ना देख पाए। इसी प्रकार हमें यह समझना चाहिए कि यह दृश्य ब्रह्मांड जिसे हम प्रकृति कहते हैं एक विशाल यंत्र है और इस यंत्र के पीछे भगवान या कृष्ण रहते हैं भगवान भगवत गीता में बताते हैं
मयाध्यक्षेण प्रकृति सूयते सचराचरम्।
हे कुंती पुत्र! यह भौतिक प्रकृति मेरी अध्यक्षता मैं कार्य करती है और सारे चर तथा अचर प्राणियों को उत्पन्न करती है।
इस श्लोक से यह साबित हो जाता है कि इस भौतिक प्रकृति रूपी यंत्र के पीछे स्वयंपूर्ण पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण नियंता बैठे हैं। लेकिन यंत्र के बारे में पूर्ण जानकारी ना होने के कारण हम नियंता को नहीं देख पा रहे हैं।
भला हम भगवान के बारे में क्यों नहीं जानते?
इसका कारण यह है कि हमें सदैव बचपन से ही ऐसी शिक्षा से वंचित रखा गया है हमें खाना सोना मैथुन करना तथा जीविकोपार्जन करना यह सिखाया गया है और यह विद्यालय शिक्षा है परंतु अब तो हर कोई जानता है यह तो पशु भी जानते हैं। यही कारण है हम भगवान को नहीं जानते हैं
प्रभुपाद जी मैसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के छात्रों से अपना प्रथम प्रश्न पूछते हुए कहते हैं कहां है वह टेक्नोलॉजी विभाग जो एक मृत् तथा जीवित मनुष्य में अंतर की खोज कर रहा है जब कोई मनुष्य मरता है तो कुछ चला जाता है कहां है वह टेक्नोलॉजी जो उसे वापस ला दे। आखिर विज्ञानी इस समस्या को हल करने का प्रयास क्यों नहीं करते?
यह बात सत्य है हम तथाकथित वर्तमान के वैज्ञानिकों पर भरोसा करते हैं प्रभुपाद जी बताते हैं कि अगर यह वैज्ञानिक सफल है और नए-नए आविष्कार कर रहे हैं। तो ऐसी टेक्नोलॉजी क्यों विकसित नहीं करते जो मनुष्य को मृत्यु के बाद भी जीवित कर सके यह असंभव है। चाहे कितने भी प्रेत निकलने ऐसा कभी नहीं कर सकते।
भगवत गीता से हमें ज्ञात होता है कि मैं अपने शरीर का स्वामी हूं और अन्य लोग अपने-अपने शरीरों के स्वामी है मैं कहता हूं मेरा हाथ किंतु मैं यह नहीं कहता कि मैं हाथ। क्योंकि यह मेरा हाथ है अतः मैं हाथ से भिन्न हूं मैं उसका स्वामी हूं इसी प्रकार हम कहते हैं मेरी आंख मेरा काम मेरा यह मेरा वह आदि आदि। इन सारी वस्तुओं में जो मेरी है मैं कहां हूं? वास्तव में हमें इन्हीं प्रश्नों के उत्तरों को ढूंढने के लिए भगवान की शरण ग्रहण करनी चाहिए।
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