भगवत गीता के अनुसार-
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वत:।।
(Krishna consciousness)
अर्थात:-हजारों मनुष्यों में से कोई एक सिद्धि🧘 के लिए प्रयत्न करता है और जिन लोगों ने सिद्धि प्राप्त कर ली🏵️ है उनमें से कोई 👉विरला👈 ही मुझे तत्व से जानता है।
समकालीन सभ्यता बहुत कुछ पशुओं की सभा जैसी है क्योंकि जैसा पहले भी बताया जा चुका है यह पशु प्रवृत्तियों के आधार पर संचालित होती है।
पक्षी(Bird)🐦 तथा पशु 🦍भोर होते ही जग🏋️ जाते हैं और भोजन🍏 तथा मैथुन की खोज में व्यस्त हो जाते हैं एवं अपनी अपनी आत्मरक्षा के लिए प्रयत्नशील रहते हैं रात्रि🌠 में आश्रय खोजते हैं और भोर 🌄होते ही पुनः बीज तथा फल की खोज में वृक्षों🌳 की ओर उड़ जाते हैं।
इसी प्रकार विश्व🌍 में भी लोगों के बड़े बड़े समूह एक द्वीप🏠 से दूसरी द्वीप की यात्रा जल नौकाओं 🚢से करते हैं जिससे आजीविका की खोज के लिए वे अपने-अपने कार्यालय जा सकें। तो यह पशु जीवन की तुलना में किस तरह से प्रगति है।
(शास्त्रों का यहां पर इस प्रकार कहना नहीं है कि आप आजीविका के लिए कहीं न जाए अपितु शास्त्र कहना चाहते हैं)
मनुष्य की आवश्यकताएं पशु पक्षियों तथा जीवो से अधिक है🤷
उदाहरण के लिए:👉यदि एक स्थान पर एक चावल 🍙का बोरा रख दिया जाए तो पशु पक्षी🐦 अपना हिस्सा लेकर चले जाएंगे यहां तक कि बंदर 🐵जैसे पशु भी अपना हिस्सा लेकर चले जाएंगे लेकिन मानव🧔 ही एक ऐसा प्राणी है जो अपनी आवश्यकता से अधिक पूरे बोरे को ले जाएगा।💁 यह मानव का स्वभाव है वह अपनी आवश्यकता से अधिक🙆 पाने की इच्छा करता है। वह अपनी जरूरत से अधिक ले जाएगा तथा संग्रह करेगा।
(Hapiness)
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः।।7.19।।
अर्थात:- कई जन्मों और मृत्यु के बाद,🤷 वह जो वास्तव में ज्ञान में है, मुझे सभी कारणों और जो कुछ भी है उसका कारण जानकर मेरी शरण में जाता है। ऐसी महान आत्मा बहुत कम मिलती है।
ऊपर लिखे श्लोक में स्पष्ट कहा गया है 👉वासुदेव: सर्वसर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः।👈 कि जो मुझे (वासुदेव)को सभी कारणों का कारण मानता है वह महात्मा दुर्लभ है।
भक्ति की विधि को सभी लोग नहीं अपितु जो बुद्धिमान🧠तथा भाग्यशाली 🫵हैं वे ही ग्रहण करते हैं उनकी एकमात्र अभिलाषा कृष्ण की सेवा करने की रहती है।
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