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कृष्णभावना की विधि।

 कृष्ण भावना की विधि तपस्या पर आधारित है। लेकिन वह अधिक कठिन नहीं है इस विधि में भोजन तथा मैथुन के लिए कुछ प्रतिबंध है। भोजन में हमें सात्विक भोजन ही लेना चाहिए हमें मांस आदि अपने स्वाद के लिए नहीं लेना चाहिए। मैथुन विवाहित जीवन तक सीमित है। इनके अतिरिक्त और भी विधि-विधान है जिनसे आध्यात्मिक अनुभूति होती है।

भक्ति वेदांत श्रीला प्रभुपाद जी बताते हैं ऐसा वैज्ञानिक दार्शनिक बनने से क्या लाभ यदि हम यह भी ना बता सके कि हमारा अगला जीवन क्या होगा?

कृष्णभवनामृत का छात्र सरलता से यह कह सकता है कि उसका अगला जीवन क्या होगा। भगवान क्या है जीव क्या है और भगवान के साथ उसका संबंध क्या है? जो भक्ति के विधि विधानों का पालन करता है उसका ज्ञान पूर्ण है यह ज्ञान भगवत गीता तथा श्रीमद भगवतम जैसे ज्ञान के पूर्ण ग्रंथों से प्राप्त हुआ है।

तो यही है वह कृष्णभावनामृत विधि।

यह अत्यंत सरल है और कोई भी मनुष्य इसे अपना सकता है। एक अत्यंत पतित जीव से लेकर के ब्रह्मा भी अगर इस विधि का पालन करते हैं तो उन्हें भी भक्ति प्राप्त होती है तथा भगवत धाम प्राप्त होता है।

यदि कोई कहता है मैं बिल्कुल पढ़ा लिखा नहीं हूं और पुस्तके नहीं पढ़ सकता (पुस्तकों का अर्थ भगवत गीता तथा अन्य ग्रंथों से है) तो भी वह अयोग्य नहीं है वह तब भी केवल महामंत्र (हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे)(Prayer for Healing)का उच्चारण करके भगवत धाम जा सकता है।

             कृष्ण के द्वारा उपहार

कृष्ण ने हमें एक जीव तथा दो कान दिए हैं और हमें यह जानकर आश्चर्य होगा कि कृष्ण(God) का साक्षात्कार (भगवान को जानना) आंखों से नहीं अपितु कानों तथा जीव से होता है। उनकी संदेश को सुनकर हम जीव को वश में करना सीखते हैं और अन्य इंद्रियां भी वश में हो जाती है

सर्व शक्तिशाली इन्द्रियों जीभ ही सर्वाधिक चटोरी है और उसको वश में करना अन्य इंद्रियों को वश में करने से अधिक कठिन है लेकिन मात्र हरे कृष्ण के कीर्तन से तथा कृष्ण प्रसाद का आस्वादन लेने से वह वर्ष में हो जाती है

       तो हमारे पुराने पापों का क्या?

आप में से किसी के मन में भी यह प्रश्न उठ सकता है इन विधि का पालन करने से हम भगवत भक्ति तो करेंगे तो हमारे पुराने पापों का क्या होगा क्या हमें उनके फलों को भोगना होगा। तो इसका उत्तर है नहीं।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

अहं त्वां सर्व पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।

अर्थात- तुम सारे धर्मों को त्याग दो केवल मेरी शरण में आ जाओ बदले में मैं समस्त पाप कर्मों के फलों से तुम्हारी रक्षा करूंगा। अतः तुम्हें डरना नहीं चाहिए (भगवत गीता 18.66)

जैसे आपने ऊपर के श्लोक में देखा भगवान कहते हैं कि केवल अगर तुम मेरी शरण ग्रहण कर लेते हो तुम बदले में मैं समस्त पाप कर्मों के फलों से तुम्हें मुक्ति प्रदान करूंगा अतः तुम्हें डरना नहीं चाहिए।

लेकिन यह सोचकर कि भगवान हमारे सभी पाप कर्मों को क्षमा कर देंगे हमें पाप नहीं करने चाहिए। यदि हम ऐसा करते हैं तो हम भगवान का प्रयोग कर रहे हैं और भगवान इसे अवगत भी हैं क्योंकि वे पूर्ण पुरुषोत्तम है।


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