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इंद्रियों को वश में कैसे करें?

            प्रथम नियंत्रण इंद्रियां


मन को वश में करने हेतु इंद्रियों को वश में करना पड़ता है हम देखते हैं कि जब भी हम कोई आध्यात्मिक बात सुनते हैं तो हमारा उस में मन नहीं लगता क्योंकि मन विकारों से भरा पड़ा है और वह हर समय भोग चाहता है और सदैव इंद्रियों को संतुष्ट करने का प्रयास करता है परंतु इंद्रियों की तुलना उस फटे हुए बॉक्स से की गई है जिसमें कुछ भी डालो वह सदैव खाली ही रहेगा।

अतः हम अपनी आंखों से कानों से जिव्हा सदैव भोग करना चाहती हैं जिव्हा को चाहिए सदैव अच्छा भोजन कान को चाहिए सदैव सांसारिक बातें सुनना आंखों को चाहिए सदा गलत दृश्य देखना इसी प्रकार हम अपनी इंद्रियों से ग्रसित है 
अतः अब आपको पता लग चुका है कि मन को नियंत्रित करने के लिए सर्वप्रथम इंद्रियों को नियंत्रित करना होगा अब भला इन को नियंत्रित करके हम कहां लगाएं। क्योंकि हर चीज के दो पहलू होते हैं जब हमारी इंद्रियां गलत कार्यों में नहीं लगी रहेगी तो उस समय निष्क्रिय नहीं होना अतः अपनी इंद्रियों को अच्छे कार्यों में लगाना है जैसे भगवत गीता पढ़ना शास्त्रों का अध्ययन करना जिसमें की बहुत सी कहानियां है या कुछ शारीरिक खेल खेलना।
हमारी आंखें केवल देख सकती है हमारे कान केवल सुन सकते हैं हमारी स्पर्श कर सकती है लेकिन हमारा मन स्वाद भी ले सकता है सुन भी सकता है उदाहरण के लिए आपको कुछ स्वादिष्ट खाने की इच्छा हुई तो उसी समय आपके मन में उस व्यंजन का ख्याल आ जाएगा और उसके स्वाद का अनुभव होगा तथा मन बोलेगा मुझे यह अभी चाहिए तब आप जाकर इच्छा प्रकट करते हो और जीव को उसके अनुसार भोजन कराते हो और सोचते हैं कि इसके बाद जिव्हा संतुष्ट हो जाएगी परंतु वाह अगली बार भी हमसे वही सब कराती है

         कुछ आध्यात्मिक प्रक्रिया

१- हमें अपने 24 घंटों में से 10 मिनट हमेशा ध्यान में लगाने चाहिए परिवर्तन आप स्वयं एक महीने में देखेंगे।

२- अगर आप वैदिक प्रणाली अनुसार भगवान की पूजा करते हैं या सदा उनसे प्रार्थना करते हैं तो आपको ध्यान के जितना ही फायदा मिलता है।


३- भगवान कृष्ण जी का 1 नाम हृषिकेश है जिसका अर्थ होता है इंद्रियों का स्वामी अतः हम भगवान कृष्ण की पूजा करके अपनी इंद्रियों को वश में आसानी से कर सकते हैं और इस विधि का पालन करके ध्यान से 10 गुना फायदा मिलता है।


अर्जुन भगवान कृष्ण से पूछता है   (peace of mind)  

                          
अथ केन उपयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुष: |

अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव योजना: || 3.36||


हे भगवान यह कौन व्यक्ति है जो मुझसे ना चाहते हुए पाप कर आ रहा है यह सदा बलपूर्वक मुझसे बात क्यों करता है


भगवान कहते हैं


काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।

महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्।।3.37।


काम और क्रोध रजोगुण के संपर्क से उत्पन्न होते हैं और यही तुमसे पाप कराता है


अगर आप इसे यहां तक पढ़ चुके हैं तो मैं जान चुका हूं कि आपकी अध्यात्म में रूचि है परंतु किसी कारण से आप इसमें प्रगति नहीं कर पा रहे हैं अतः मन ही आपको सबसे बड़ी परेशानी लगता है आप निश्चिंत हो जाएंगे अगर आप भगवद गीता पढ़ेंगे तो क्योंकि उसमें सभी प्रश्नों का उत्तर है जो कि आपके जीवन में सदैव सहायता करेंगी और कृष्ण भगवान जैसे मार्गदर्शक तथा प्रिय मित्र प्रिय हितैषी आपकी सहायता करेंगे।

मन को इंद्रिय विषयों से हटाकर भगवान् मैं लगाना ही अध्यात्म है जैसे सिक्का उछालने पर या तो हेड आता है या तो टेल उसी प्रकार अगर मन इंद्र विषयों में नहीं रहेगा तो भगवान की सेवा में रहेगा यदि भगवान की सेवा में नहीं रहेगा तो इंद्रिय विषयों में रहेगा बिल्कुल हेड और टेल की भांति।

अगले आर्टिकल में इससे भी स्पष्ट जानकारी मैं आपको देने का प्रयास करूंगा जो कि संपूर्ण शास्त्रों के अनुसार तथा मेरे एक्सपीरियंस और अध्ययन के अनुसार होती है।


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