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दुख का मूल कारण
प्रत्येक व्यक्ति संसार में सुखी(Happir) होना चाहता है और सदा ही सुख के लिए प्रयास करता है लेकिन वह जीवन पर्यंत समझ नहीं पाता है कि उसकी अवांछित इच्छाएं ही दुखों का कारण है वह सदैव सोचता है अगर मेरे पास यह होता तो मुझे अच्छा लगता और सदैव उसको पाने के बाद भी वह उससे बड़ी चीज के बारे में सोचता है और ना मिलने पर दुखी होता है और अपने को संसार के सम्मुख दुखी कहता है वास्तव में वह अपनी अवांछित एक शाम के कारण दुख भोग रहा है।
तो क्या इच्छाएं रखना गलत है?
बहुत से लोगों का प्रश्न होता है क्या इसका अर्थ यह है कि हम कुछ इच्छा ही ना रखें। नहीं ऐसा नहीं है इच्छा रखना जायज है लेकिन अवांछित इच्छा रखना सही नहीं है श्रीला प्रभुपाद कहते थे कि मनुष्य एक गधे की भांति कार्य कर रहा है उसका मालिक उसके ऊपर बैठकर एक घास की गड्डी लिए है और गधा सदैव सोचता है अगर मैं एक कदम आगे बढूंगा तो मुझे घास प्राप्त हो जाएगी यही अवांछित इच्छाएं है। सदैव हम यह सोचते हैं कि अगर मेरे पास यह कार होगी तो मैं खुश रहूंगा बेशक आप उस कार के लिए परिश्रम कीजिए लेकिन उस कार के आ जाने पर अब यह बहाना न मारे यह कार इतनी अच्छी नहीं है इससे मुझे सुख प्राप्त नहीं हुआ तो वास्तव में हम सदैव अपनी इच्छाओं के कारण ही सदैव कुछ नया पाने की इच्छा करते हैं जैसे कि एक गधा।
वास्तविक सुख क्या है
वास्तव में हम सुख को सांसारिक चीजों में ढूंढते हैं वह कुछ इस प्रकार है जैसे कि कूड़ेदान में सोने की वस्तुओं को ढूंढना ऐसा नहीं है कि हम सांसारिक चीजों में मजा नहीं है मजा है परंतु वह क्षणभंगुर है यह बात आपको सुनने में उबाऊ महसूस करा सकती है लेकिन यह वास्तविक सुख की बात है।
हम लोगों ने अपनी पहचान इस शरीर से की है इसी कारण हम शरीर की सुख सुविधा के अनुसार ही सुख तथा दुख को बांट देते हैं। वास्तव में हम पवित्र आत्मा है जिस पर गर्मी सर्दी का कोई असर नहीं होता तो सुख दुख तो क्या चीज है हमें इस बात को गंभीरता से लेना चाहिए फिर बात आती है कि हम आत्मा हैं तो हम धरती पर आई क्यों हैं हम संसार की चीजें समेटने नहीं आई है हम वास्तविक में अपने को जानने आए हैं हमारा नित्यस्वरूप भगवान की सेवा करना हैं (Hapiness)
कहानी के माध्यम से समझाने का प्रयास।
एक बार एक बच्चा अपने माता-पिता के साथ मेले में घूमने को जाता है वह देखता है कि वह अपने माता-पिता से बिछड़ चुका है तथा वह बहुत ही ज्यादा रोता है प्रथम व्यक्ति उसके पास आता है और पूछता है तुम कौन हो तुम्हारे माता-पिता कहां है और वह कुछ समय के लिए अपना रोना बंद करके उसे बताता है। और फिर रोना शुरू करता है
दूसरा व्यक्ति आता है उसे कुछ खाने को देता है तथा वह बच्चा उसको खा कर के खुश हो जाता है तथा कुछ समय बाद फिर होने लगता है
तीसरा व्यक्ति बच्चे के पास आता है और उसे उसके माता-पिता के बारे में पूछ कर उसके माता-पिता से मिला देता है तथा बच्चा फिर नहीं रोता।
इसी प्रकार संसार में भी हम उस खोए हुए बच्चे के समान है जो कि अपने माता-पिता से बिछड़ चुका है अर्थात भगवान तथा संसार के लोग हमसे मित्रता करते हैं अच्छी बातें करते हैं तो हम कुछ देर तक सुखी रहते हैं या खुश रहते हैं लेकिन बाद में हम फिर से रोने लगते हैं दुखों के कारण और व्यक्ति आते हैं वह हमें ट्रीट करते हैं उनके साथ हमें और आनंद आता है और उसे ही हम वास्तविक सुख समझते हैं लेकिन उस वस्तु के खत्म होते ही फिर से रोना शुरू हो जाता है अब हमें उस व्यक्ति को ढूंढना है जोकि हमें अपने वास्तविक परिवार से मिलाएं
वह व्यक्ति और कोई नहीं आध्यात्मिक(spritual) गुरु कहलाता है
और वह आध्यात्मिक गुरु हमें भगवान के धाम ले जाने में हमारी सहायता करते हैं और उसके बाद हम कभी भी दुख रूपी संसार में नहीं आते तथा सदैव सुखी रहते हैं तो हम यह तो समझ गए कि वास्तविक सुख संसार में नहीं है क्योंकि हम भीड़ में खो चुके हैं हमें चाहिए आध्यात्मिक गुरु के साथ हाथ पकड़कर अपने वास्तविक घर की तलाश में चलें अगर आप मेरे माध्यम से इस आर्टिकल को पढ़ते हैं तो मैं उस व्यक्ति का भी पता आपको बताऊंगा जो आपको भगवान से अर्थात अपने परिवार से मिलाने में सक्षम है
जिस प्रकार एक आइसक्रीम का स्वभाव होता है ठंडा होना वैसे ही संसार का एक स्वभाव है दुख जिस प्रकार आइसक्रीम गर्म नहीं होती वैसे ही संसार भी सुखी नहीं हो सकता तथाकथित मोटिवेशनल स्पीकर यह सुनकर कि हम दुनिया बदल सकते हैं तो ऐसा नहीं है हम वास्तव में मृत्यु को नहीं रोक सकते हैं दुनिया बदल ना तो खैर बड़ी बात है अर्थात आप अपने आध्यात्मिक जीवन के बारे में भी सोचे और रही आपके काम की बात जो कि संसार में आप करते हैं तो आप उनको करते-करते भी अध्यात्म रह सकते हैं और जो आपको कहे कि यह आध्यात्मिक प्रक्रिया क्यों कर रहे हो तो आप उनसे कह सकते हो आप मेरे शरीर के मित्र या मेरे शरीर के परिवारजन हो लेकिन आप मेरी आत्मा के नहीं हो अर्थात यह आध्यात्मिक प्रक्रिया में अपने आत्मा हेतु कर रहा हूं आप का कोई हक नहीं बनता मुझे आध्यात्मिक प्रक्रिया से रोकने का हो सकता है आप सांसारिक रुप से मेरे परिवारजन हो लेकिन आध्यात्मिक रूप से मैं भगवान का दास हूं।
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