यत्तदग्रेविषिव परिणामेऽमृतोपमम् । तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥37॥ अर्थात- जो प्रारंभ में विष 🥃तुल्य हो किंतु अंत में अमृततुल्य हो जाता है और जो मनुष्य को आत्म साक्षात्कार के लिए जागृत🧘 करता है वह सात्विक सुख🧖 कहलाता है। * एक बार आध्यात्मिक पद प्राप्त कर लेने पर भौतिक कार्य (🧗🚵🤼🤹) (material work) उबाने🥱(boring) लगते हैं। उदाहरण के तौर पर यदि कोई जीवन भर हरे कृष्णा का जप-कीर्तन 📿करे तो वह नामों से उबेगा नहीं,🙅 जबकि 💁भौतिक नाम का बारंबार उच्चारण करने से वह तुरंत ऊब 🙍उठेगा। यह वास्तविकता है।🤷 * जो जितना ही कृष्ण के नामों का कीर्तन📿 करता है, वह उतना ही उसमें अधिक अनुरक्त होता जाता है 🧖इस प्रकार श्रवण👂 तथा कीर्तनम🪘 अर्थात कृष्ण के विषय में सुनना और कहना वह सेवा का शुभारंभ है।🪔 अगर आप इन विधियों को प्रारंभ कर चुके हैं अर्थात आप वास्तविक भक्ति कर रहे हैं।🛕 * भगवत गीता📖 के (2.40) दूसरे अध्याय के 40 वें श्लोक केअनुसार जो मनुष्य कृष्णभवनामृत प्रारंभ करता है वह कुछ भी नहीं होता। श्लोक का अर्थ कुछ इस प्रकार है "इस प्रयास में ना तो कोई हानि है,🙅 न ...
भगवत गीता के अनुसार- मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये । यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वत:।। (Krishna consciousness) अर्थात:-हजारों मनुष्यों में से कोई एक सिद्धि🧘 के लिए प्रयत्न करता है और जिन लोगों ने सिद्धि प्राप्त कर ली🏵️ है उनमें से कोई 👉विरला👈 ही मुझे तत्व से जानता है। समकालीन सभ्यता बहुत कुछ पशुओं की सभा जैसी है क्योंकि जैसा पहले भी बताया जा चुका है यह पशु प्रवृत्तियों के आधार पर संचालित होती है। पक्षी(Bird)🐦 तथा पशु 🦍भोर होते ही जग🏋️ जाते हैं और भोजन🍏 तथा मैथुन की खोज में व्यस्त हो जाते हैं एवं अपनी अपनी आत्मरक्षा के लिए प्रयत्नशील रहते हैं रात्रि🌠 में आश्रय खोजते हैं और भोर 🌄होते ही पुनः बीज तथा फल की खोज में वृक्षों🌳 की ओर उड़ जाते हैं। इसी प्रकार विश्व🌍 में भी लोगों के बड़े बड़े समूह एक द्वीप🏠 से दूसरी द्वीप की यात्रा जल नौकाओं 🚢से करते हैं जिससे आजीविका की खोज के लिए वे अपने-अपने कार्यालय जा सकें। तो यह पशु जीवन की तुलना में किस तरह से प्रगति है। (शास्त्रों का यहां पर इस प्रकार कहना नहीं है कि आप आजीविका के लिए कहीं न जाए अपितु शास्त...