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अप्रैल, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

क्या 🤷भक्ति से हमें लाभ होगा।

 यत्तदग्रेविषिव परिणामेऽमृतोपमम् । तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥37॥ अर्थात- जो प्रारंभ में विष 🥃तुल्य हो किंतु अंत में अमृततुल्य हो जाता है और जो मनुष्य को आत्म साक्षात्कार के लिए जागृत🧘 करता है वह सात्विक सुख🧖 कहलाता है। * एक बार आध्यात्मिक पद प्राप्त कर लेने पर भौतिक कार्य (🧗🚵🤼🤹) (material work) उबाने🥱(boring) लगते हैं। उदाहरण के तौर पर यदि कोई जीवन भर हरे कृष्णा का जप-कीर्तन 📿करे तो वह नामों से उबेगा नहीं,🙅 जबकि 💁भौतिक नाम का बारंबार उच्चारण करने से वह तुरंत ऊब 🙍उठेगा। यह वास्तविकता है।🤷 * जो जितना ही कृष्ण के नामों का कीर्तन📿 करता है, वह उतना ही उसमें अधिक अनुरक्त होता जाता है 🧖इस प्रकार श्रवण👂 तथा कीर्तनम🪘 अर्थात कृष्ण के विषय में सुनना और कहना वह सेवा का शुभारंभ है।🪔 अगर आप इन विधियों को प्रारंभ कर चुके हैं अर्थात आप वास्तविक भक्ति कर रहे हैं।🛕 * भगवत गीता📖 के (2.40) दूसरे अध्याय के 40 वें श्लोक केअनुसार जो मनुष्य कृष्णभवनामृत  प्रारंभ करता है वह कुछ भी नहीं होता। श्लोक का अर्थ कुछ इस प्रकार है "इस प्रयास में ना तो कोई हानि है,🙅 न ...

कृष्ण भक्ति सौभाग्य 🙆 है।

 भगवत गीता के अनुसार- मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये । यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वत:।। (Krishna consciousness) अर्थात:-हजारों मनुष्यों में से कोई एक सिद्धि🧘 के लिए प्रयत्न करता है और जिन लोगों ने सिद्धि प्राप्त कर ली🏵️ है उनमें से कोई 👉विरला👈 ही मुझे तत्व से जानता है। समकालीन सभ्यता बहुत कुछ पशुओं की सभा जैसी है क्योंकि जैसा पहले भी बताया जा चुका है यह पशु प्रवृत्तियों के आधार पर संचालित होती है। पक्षी(Bird)🐦 तथा पशु 🦍भोर होते ही जग🏋️ जाते हैं और भोजन🍏 तथा मैथुन की खोज में व्यस्त हो जाते हैं एवं अपनी अपनी आत्मरक्षा के लिए प्रयत्नशील रहते हैं रात्रि🌠 में आश्रय खोजते हैं और भोर 🌄होते ही पुनः बीज तथा फल की खोज में वृक्षों🌳 की ओर उड़ जाते हैं। इसी प्रकार विश्व🌍 में भी लोगों के बड़े बड़े समूह एक द्वीप🏠 से दूसरी द्वीप की यात्रा जल नौकाओं 🚢से करते हैं जिससे आजीविका की खोज के लिए वे अपने-अपने कार्यालय जा सकें। तो यह पशु जीवन की तुलना में किस तरह से प्रगति है। (शास्त्रों का यहां पर इस प्रकार कहना नहीं है कि आप आजीविका के लिए कहीं न जाए अपितु  शास्त...

जीभ के स्वाद👅 हेतु पशु हत्या

कानून👮 के अनुसार यदि कोई किसी को मार डालता है तो उसे मृत्युदंड की सजा होती है जीवन के बदले जीवन लेने की विचारधारा नयी नहीं है। अपितु यह मानव जाति के लिए कानून का ग्रंथ 📖,मनुसंहिता में पायी जाती है। *उसमें यह कहा गया है कि जब राजा🤴 किसी हत्यारे को फांसी देता है तो वास्तव में उससे हत्यारा लाभान्वित होता है क्योंकि यदि उसे मारा💀 नहीं जाता है, तो वह अपनी हत्या का फल अपने साथ लेता जाएगा और उसे अनेक प्रकार से कष्ट भोगने पड़ेंगे।(Krishna) ( मनु संहिता में 'जीवन के बदले जीवन' का अधिकार दिया गया है🙎)(peace of mind) *इसी प्रकार अन्य ऐसे नियम भी है जिनके अनुसार मनुष्य 🧍एक चींटी 🐜को भी नहीं मार सकता अगर वह ऐसा करता है तो उसकी जिम्मेदारी उसे स्वीकार करनी होगी🤷। (क्योंकि एक मनुष्य 🚶‍♂️में स्थित आत्मा 👻तथा एक चींटी🐜 में स्थित आत्मा में कोई भेद नहीं अतः उनका शरीर का भेद है चाहे हम 👑ब्रह्मा(उच्च पद) से लेकर एक चींटी🐜 तक को देखें तो दोनों में जीव (आत्मा) एक ही है।) १- हम किसी जीव🐔 को उत्पन्न नहीं कर सकते हैं, अतः हमें उसे मारने🐐 का अधिकार भी नहीं है; अतः जो मानव निर्मित नियम मनुष्...

कृष्ण के आदेश का पालन।

लोग अगले जन्म में विश्वास नहीं करते हैं क्योंकि वह व्यर्थ की झंझट तथा दंड से बचना चाहते हैं लेकिन अगले जन्म से बचा नहीं जा सकता।🙅 केवल यह सोचने भर से की अगला जन्म नहीं होता फिर भी आपको दंड तथा जन्म तो लेना होगा।🙎 यदि कोई अपराध करता है तो सरकार उसे दंडित करेगी। किंतु कभी-कभी अपराधी सरकार द्वारा दंडित होने से बच निकलता है (लेकिन ईश्वरीय नियम के बारे में ऐसा नहीं होता)कोई भले ही दूसरों को धोखा दे ले, चोरी करके छिप जाए और इस तरह राज्य के दंड से अपने को बचा ले किंतु वह अपने आप को श्रेष्ठ नियम या प्रकृति के नियम से नहीं बचा सकता। * यदि वह सोचता है कि मेरे पापों का साक्षी कौन है-दिन का प्रकाश🌅 साक्षी है चांदनी🌝 साक्षी है वायु 🌬️साक्षी है और कृष्ण तो सबसे बड़े साक्षी हैं।👇 * इस तरह कोई यह नहीं कह सकता "मैं यह पाप कर रहा हूं किंतु मुझे कोई नहीं देख सकता।"कृष्ण सबसे बड़े साक्षी हैं क्योंकि वह ह्रदय में विराजमान हैं।   (सर्वस्य चाहं ह्रदि सन्विष्ट:)- मैं हर एक के ह्रदय🫀 में स्थित हूं।👉 (मत्त: स्मृति ज्ञानम अपोहनं च)- मुझसे ही स्मृति🧠, ज्ञान📖 तथा विस्मृति🤔 उत्पन्न होते हैं।...

भौतिक दलदल से उद्धार।

 हमारी चर्चा का विषय अत्यंत ही उत्तम तथा उत्कृष्ट है-भगवान श्री कृष्ण।😇 महाराज परीक्षित कथा सुखदेव गोस्वामी के बीच विचार विमर्श 🗣️में देखा गया एक अत्यंत पतित तथा सभी प्रकार के पाप कर्म करने वाले ब्राह्मण की रक्षा एकमात्र कृष्ण के पवित्र नाम का कीर्तन📿 करने के कारण हुई। श्रीमद भगवतम में हमें ब्रह्मांड में अधोलोकों🌌 एवं स्वर्गीय 🌕उच्च लोकों के वर्णन मिलते हैं। श्रीमद भगवतम 📖में इन लोकों की सही सही स्थिति एवं गृह से उनकी दूरी का वैसा ही संकेत मिलता है जैसा कि खगोलज्ञों ने अनुमान लगाया है कि चंद्रमा🌕 तथा अन्य ग्रह 🌍(लोक) पृथ्वी से कितने दूर हैं। सुखदेव गोस्वामी से ऐसे ग्रहों का वर्णन सुनने पर परीक्षित महाराज ने कहा-💁 हे महाभाग! मैंने आपसे नर्क👹 लोकों के विषय में सुना। जो लोग अत्यंत पापी होते हैं वह इन लोकों को भेजे जाते हैं।  परीक्षित महाराज वैष्णव (भक्त)😇 थे एक वैष्णव सदा औरों के कष्ट के प्रति दया का अनुभव करता है। एक वैष्णव दया का सागर होता है। कृष्ण शुद्ध वैष्णव के चरण कमलों पर किए गए अपराधों को कभी नहीं सह सकते अतः हमें वैष्णव की निंदा नहीं करनी चाहिए।🙅 वञ्छा कल्पत...

कृष्णभावना की विधि।

 कृष्ण भावना की विधि तपस्या पर आधारित है। लेकिन वह अधिक कठिन नहीं है इस विधि में भोजन तथा मैथुन के लिए कुछ प्रतिबंध है। भोजन में हमें सात्विक भोजन ही लेना चाहिए हमें मांस आदि अपने स्वाद के लिए नहीं लेना चाहिए। मैथुन विवाहित जीवन तक सीमित है। इनके अतिरिक्त और भी विधि-विधान है जिनसे आध्यात्मिक अनुभूति होती है। भक्ति वेदांत श्रीला प्रभुपाद जी बताते हैं ऐसा वैज्ञानिक दार्शनिक बनने से क्या लाभ यदि हम यह भी ना बता सके कि हमारा अगला जीवन क्या होगा? कृष्णभवनामृत का छात्र सरलता से यह कह सकता है कि उसका अगला जीवन क्या होगा। भगवान क्या है जीव क्या है और भगवान के साथ उसका संबंध क्या है? जो भक्ति के विधि विधानों का पालन करता है उसका ज्ञान पूर्ण है यह ज्ञान भगवत गीता तथा श्रीमद भगवतम जैसे ज्ञान के पूर्ण ग्रंथों से प्राप्त हुआ है। तो यही है वह कृष्णभावनामृत विधि। यह अत्यंत सरल है और कोई भी मनुष्य इसे अपना सकता है। एक अत्यंत पतित जीव से लेकर के ब्रह्मा भी अगर इस विधि का पालन करते हैं तो उन्हें भी भक्ति प्राप्त होती है तथा भगवत धाम प्राप्त होता है। यदि कोई कहता है मैं बिल्कुल पढ़ा लिखा नहीं हूं और ...

हम भला संसार में क्यों आए हैं?

     हमारा संसार में आने का उद्देश्य हमारा उद्देश्य मनुष्य को उसकी मूल चेतना में वापस लाना है। जब बरसात से जल बरसता है तो वह आसुत जल की भांति प्रदूषण रहित होता है किंतु भूमि का स्पर्श करते ही वह गंदा हो जाता है इसी प्रकार मूलतः हम शुद्ध आत्मा है कृष्ण के अंश हैं। भगवान कृष्ण गीता में कहते हैं ममैवांशो जीवलोके जीवभूत सनातन। अर्थात- इस बद्ध जगत में सारे जीव मेरे अंश है और वे शाश्वत हैं।  इस प्रकार सारे जीव कृष्ण भगवान का अंश हैं हमें सदा यह स्मरण रखना चाहिए जब हम कृष्ण की बात करते हैं तो हम भगवान की बात करते हैं जिस प्रकार सोनी का एक कण गुण दृष्टि से सोने की खान के ही समान होता है उसी प्रकार कृष्ण के शरीर के सूक्ष्म अंश भी कृष्ण के ही समान हैं। अर्थात हम गुणात्मक दृष्टि से भगवान के ही समान है लेकिन मनुष्य को यह सदा स्मरण रखना चाहिए सोने की खान तथा सोने के कण में गुणात्मक दृष्टि से कोई भिन्नता नहीं होती लेकिन वह भी भिन्नता मूल्य के अनुसार होती है। यहां पर भगवान को अग्नि के अनुसार भी बताया जाता है जिस प्रकार भगवान एक प्रज्वलित अग्नि के समान हैं और हम उनके अंश चिंगारीयों ...

आध्यात्मिक सुख क्या है?

        भौतिक सुख एक दिखावा आध्यात्मिक सुख की हर कोई बात कर रहा है और इसे सुनकर आपको हमेशा ऐसा लगता होगा कि जैसे यह कोई उम्र है या फिर माता-पिता👨‍👩‍👦 सोचते हैं यह कोई उम्र है 🤷भजन करने की भक्ति करने की या आध्यात्मिक प्रक्रिया करने की। तो हमें उनसे प्रश्न पूछना चाहिए🙎 तो आप बताइए वह कौन सी उम्र होती है और अगर बड़े होने के बाद ऐसी क्रियाएं करते हैं तो क्या आप इस विधि को अपना चुके हैं। और अगर ऐसा कोई वृद्ध👴 व्यक्ति कहता है तो आप देख सकते हैं कि वह भी अभी तक उस प्रक्रिया को नहीं अपनाया है तो हम यह कैसे कह सकते हैं कि वृद्धावस्था 👴में हम उस प्रक्रिया को अपना देंगे वैसे वास्तविक सत्य तो मृत्यु है 👹यहां तक हम यह भी नहीं कह सकते कि हम वृद्ध होंगे भी। तो ऐसे में आप ऐसा कैसे कह सकते हैं कि हम वृद्ध होकर ही भजन 📿करेंगे।(Peace of mind)                  कर्मकांड से परे आध्यात्मिक प्रक्रिया को हम कर्मकांड से तोलते हैं लेकिन आध्यात्मिकता उससे परे है 💁आध्यात्मिक वह शांति है जो आपको शीतलता😇 नम्रता 🤗ज्ञान 📖ध्यान🧘 तथा विरक्ति प...

वास्तविक सुख कहां है?

              दुख का मूल कारण प्रत्येक व्यक्ति संसार में सुखी(Happir) होना चाहता है और सदा ही सुख के लिए प्रयास करता है लेकिन वह जीवन पर्यंत समझ नहीं पाता है कि उसकी अवांछित इच्छाएं ही दुखों का कारण है वह सदैव सोचता है अगर मेरे पास यह होता तो मुझे अच्छा लगता और सदैव उसको पाने के बाद भी वह उससे बड़ी चीज के बारे में सोचता है और ना मिलने पर दुखी होता है और अपने को संसार के सम्मुख दुखी कहता है वास्तव में वह अपनी अवांछित एक शाम के कारण दुख भोग रहा है।      तो क्या इच्छाएं रखना गलत है? बहुत से लोगों का प्रश्न होता है क्या इसका अर्थ यह है कि हम कुछ इच्छा ही ना रखें। नहीं ऐसा नहीं है इच्छा रखना जायज है लेकिन अवांछित इच्छा रखना सही नहीं है श्रीला प्रभुपाद कहते थे कि मनुष्य एक गधे की भांति कार्य कर रहा है उसका मालिक उसके ऊपर बैठकर एक घास की गड्डी लिए है और गधा  सदैव सोचता है अगर मैं एक कदम आगे बढूंगा तो मुझे घास प्राप्त हो जाएगी यही अवांछित इच्छाएं है। सदैव हम यह सोचते हैं कि अगर मेरे पास यह कार होगी तो मैं खुश रहूंगा बेशक आप उस कार के लिए प...

इंद्रियों को वश में कैसे करें?

            प्रथम नियंत्रण इंद्रियां मन को वश में करने हेतु इंद्रियों को वश में करना पड़ता है हम देखते हैं कि जब भी हम कोई आध्यात्मिक बात सुनते हैं तो हमारा उस में मन नहीं लगता क्योंकि मन विकारों से भरा पड़ा है और वह हर समय भोग चाहता है और सदैव इंद्रियों को संतुष्ट करने का प्रयास करता है परंतु इंद्रियों की तुलना उस फटे हुए बॉक्स से की गई है जिसमें कुछ भी डालो वह सदैव खाली ही रहेगा। अतः हम अपनी आंखों से कानों से जिव्हा सदैव भोग करना चाहती हैं जिव्हा को चाहिए सदैव अच्छा भोजन कान को चाहिए सदैव सांसारिक बातें सुनना आंखों को चाहिए सदा गलत दृश्य देखना इसी प्रकार हम अपनी इंद्रियों से ग्रसित है  अतः अब आपको पता लग चुका है कि मन को नियंत्रित करने के लिए सर्वप्रथम इंद्रियों को नियंत्रित करना होगा अब भला इन को नियंत्रित करके हम कहां लगाएं। क्योंकि हर चीज के दो पहलू होते हैं जब हमारी इंद्रियां गलत कार्यों में नहीं लगी रहेगी तो उस समय निष्क्रिय नहीं होना अतः अपनी इंद्रियों को अच्छे कार्यों में लगाना है जैसे भगवत गीता पढ़ना शास्त्रों का अध्ययन करना जिसमें की बहुत सी...

क्या मन को वश में किया जा सकता है?

जब हम कभी मन को वश में करने की बात करते हैं तो हमारे मन में उबाऊ सी प्रक्रियाएं आती है। जिनको करने में काफी समय लग जाता है। मन हमेशा हमें उस काम को करने हेतु मना करता है जिससे कि जीवन में सफलता मिले। आश्चर्य होता है कि हम फिर भी इसे अपना मित्र मानते रहते हैं तो भला किस प्रकार हम इस मन को बिना किसी उबाऊ प्रक्रिया के वश में करें।                     मन का कार्य मन हमेशा हमें नया बहाना खोजने की सलाह देता है जैसे कि-( सुबह अलार्म बजने पर ऐसा नहीं कहता अलार्म बंद करके सो जा नहीं वह कहता है कुछ देर सो जाता हूं फिर उठूंगा) यही मन की चाल है इसी प्रकार मन कार्य करता है यह हमें संतुष्ट करता है और मित्र बनने का प्रयास करता है और अंत में देर से उठने पर कहता है (देखा आज भी तू जल्दी नहीं उठा) ‌ और इस प्रकार हमें हमेशा अपनी चालाकी से विचलित कर लेता है।                 महापुरुषों के कथन (peace of mind) * महात्मा बुद्ध की कई विचारों में से एक विचार है कि जो अपने ही मन द्वारा पराजित है वह दूसरे को कभी पराजित नहीं कर...