यत्तदग्रेविषिव परिणामेऽमृतोपमम् । तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥37॥ अर्थात- जो प्रारंभ में विष 🥃तुल्य हो किंतु अंत में अमृततुल्य हो जाता है और जो मनुष्य को आत्म साक्षात्कार के लिए जागृत🧘 करता है वह सात्विक सुख🧖 कहलाता है। * एक बार आध्यात्मिक पद प्राप्त कर लेने पर भौतिक कार्य (🧗🚵🤼🤹) (material work) उबाने🥱(boring) लगते हैं। उदाहरण के तौर पर यदि कोई जीवन भर हरे कृष्णा का जप-कीर्तन 📿करे तो वह नामों से उबेगा नहीं,🙅 जबकि 💁भौतिक नाम का बारंबार उच्चारण करने से वह तुरंत ऊब 🙍उठेगा। यह वास्तविकता है।🤷 * जो जितना ही कृष्ण के नामों का कीर्तन📿 करता है, वह उतना ही उसमें अधिक अनुरक्त होता जाता है 🧖इस प्रकार श्रवण👂 तथा कीर्तनम🪘 अर्थात कृष्ण के विषय में सुनना और कहना वह सेवा का शुभारंभ है।🪔 अगर आप इन विधियों को प्रारंभ कर चुके हैं अर्थात आप वास्तविक भक्ति कर रहे हैं।🛕 * भगवत गीता📖 के (2.40) दूसरे अध्याय के 40 वें श्लोक केअनुसार जो मनुष्य कृष्णभवनामृत प्रारंभ करता है वह कुछ भी नहीं होता। श्लोक का अर्थ कुछ इस प्रकार है "इस प्रयास में ना तो कोई हानि है,🙅 न ...
हमारा मूल उद्देश्य आप सभी को भगवान के वचन प्रदत्त कराना है 🙏हर कोई व्यक्ति संसार में एक ऐसे सारथी को चाहता है जो जीवन में उसका मार्गदर्शन करें वह केवल श्री कृष्ण हैं और कोई नहीं।🚩😇